दूर उनसे कभी हुआ हुआ न हुआ
मुद्दतों वस्ल मगर हुआ हुआ न हुआ
जिद है ज़िंदा रहने की , रहेगी
हवा से राब्ता हुआ हुआ न हुआ
हो गये कायल हम भी तीरगी के
किसे गरज दिन हुआ हुआ न हुआ
लुटा दी जान जिस्म रूह मगर
इश्क का क्या हुआ हुआ न हुआ
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें