शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012



मुद्दा--ज़ीस्त, तुम भी न समझ पाओगे
आज आए हो, कल तुम भी चले जाओगे।
कब हँसे थे,कहाँ रोए थे,कहाँ कब क्यूँ
अब जो चाहो भी समझना तो उलझ जाओगे।
रात के बाद सुबह यूँ तो हुआ करती है
तुम न जागे तो कहो कैसे जहॉं पाओगे।
आसमानों से भी ऊपर है मकाँ जिनके
रहमत से भला उनके कहाँ क्‍या पाओगे।
ओस की बूँद से सीखो जीने की अदा
वरना दरिया सा समंदर में समा जाओगे।
बाँध लो आज मुट्ठी में गमो जिल्‍लत
कल तारीख के पन्‍नों में पढ़े जाओगे।
सूखे पत्‍तों की तरह रिश्‍ते भी पुराने होंगे
शाख से टूट के इक रोज बिखर जाओगे।
तेरा मिज़ाज़ भी मौसम की तरह है प्रकाश
        देख के धार हवाओं के बदल जाओगे ।


( मेरी पुस्तक "वक्त बेवक़्त"  से )

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

मेरी पहली प्रकाशित पुसतक " वक्त बेवक्त" आपकी अदालत में पेश है।

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

" वक्त बेवक़्त" मेरी पहली प्रकाशित पुस्तक है. 
प्रकाशक  का विवरण दूसरे संदेशों में दे रहा हूँ.



शनिवार, 1 सितंबर 2012

"वक्त बेबक्त" मेरी कुछ नाफ़रमान ग़ज़लों , कविताओं, नज़्मों का एक गुलदस्ता है जिसमें काँटें भी हैं और फूल भी. देहात की मिट्टी की सोंधी खूशबू भी है तो दिलों में सुलगती विद्रोह की आँच भी.

वक्त बेवक्त 

रविवार, 27 मई 2012



मुखालिफ़ ख्वाब हो गए, क्या करें
अब दूसरी दवा, क्या करें

मिरी मसाफ़त को डर लगने लगा है 

शायद मंजिलों का पता मिलने लगा है 

बुधवार, 2 मई 2012


अश्‍कों से वज़ु  कर लो इबादत कर लो यादों से
ये ईश्‍क का  मजहब है यहां  जरूरत क्‍या नमाजों से

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

ये तो वफ़ा मुहब्बत ईमान की बातें हैं 
ना मालूम  किस जहान की बातें हैं

सोए ख्वाबों की ताबीरात करते 
जो न कह पाए  वो बात करते 

तुम हवाओं में विखरे पड़े हो 
गर जो होते मुलाकात करते