शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012



मुद्दा--ज़ीस्त, तुम भी न समझ पाओगे
आज आए हो, कल तुम भी चले जाओगे।
कब हँसे थे,कहाँ रोए थे,कहाँ कब क्यूँ
अब जो चाहो भी समझना तो उलझ जाओगे।
रात के बाद सुबह यूँ तो हुआ करती है
तुम न जागे तो कहो कैसे जहॉं पाओगे।
आसमानों से भी ऊपर है मकाँ जिनके
रहमत से भला उनके कहाँ क्‍या पाओगे।
ओस की बूँद से सीखो जीने की अदा
वरना दरिया सा समंदर में समा जाओगे।
बाँध लो आज मुट्ठी में गमो जिल्‍लत
कल तारीख के पन्‍नों में पढ़े जाओगे।
सूखे पत्‍तों की तरह रिश्‍ते भी पुराने होंगे
शाख से टूट के इक रोज बिखर जाओगे।
तेरा मिज़ाज़ भी मौसम की तरह है प्रकाश
        देख के धार हवाओं के बदल जाओगे ।


( मेरी पुस्तक "वक्त बेवक़्त"  से )

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