जानकीपुल: कलावंती की
साधारण लगने वाली संवेदानाएँ कलावंतीजी के शब्दों का अाश्रय पाकर असाधारण बन जाती हैं। यही बात मुझे अच्छी लगती है ा अौर यही बात उन्हें अौरों से अलग करती है।
शनिवार, 3 जनवरी 2015
बुधवार, 24 दिसंबर 2014
आज की ताजा ग़ज़ल
ग़म छुपा आँख में बस हँसा कीजिए
ज़िंदगी है किताब बस पढ़ा कीजिए
कब तलक अश्क बन के रुलाता रहे
ग़म गले से लगा मुस्कुरा दीजिए
दूर मंजिल नहीं बस यहीं पास है
बायकीं दो कदम तो चला कीजिए
कल कहाँ कौन हो ये किसे है खबर
आज का दिन तो है बस जिया कीजिए
मर्ज़े इश्क हुआ तो हुआ बस हुआ
अब दवा लीजिए या दुआ लीजिए
जाने मंज़िल कभी यूँ मिले ना मिले
आप तो बस सफ़र का मज़ा लीजिए
ग़म छुपा आँख में बस हँसा कीजिए
ज़िंदगी है किताब बस पढ़ा कीजिए
कब तलक अश्क बन के रुलाता रहे
ग़म गले से लगा मुस्कुरा दीजिए
दूर मंजिल नहीं बस यहीं पास है
बायकीं दो कदम तो चला कीजिए
कल कहाँ कौन हो ये किसे है खबर
आज का दिन तो है बस जिया कीजिए
मर्ज़े इश्क हुआ तो हुआ बस हुआ
अब दवा लीजिए या दुआ लीजिए
जाने मंज़िल कभी यूँ मिले ना मिले
आप तो बस सफ़र का मज़ा लीजिए
सोमवार, 3 नवंबर 2014
बुधवार, 22 अक्टूबर 2014
अंधेरा जब भी ज़हाँ को काला कर गया
वो जलाकर घर अपना उजाला कर गया
गया वो छोड़ यहीं पर, अपने सभी असबाब
जो लाया था वो सबके हवाला कर गया
जिया ऐसे, जैसे कयामत में कोई आफ़ताब
मरा, तो पूरी दुनिया का निवाला कर गया
लोग पागल हो गए, जमा करते रहे ताहयात
वो गँवा के सब सबको धनवाला कर गया
रौशनी ही तकमील थी उसकी "प्रकाश"
वो दीया था जो जलकर उजाला कर गया
वो जलाकर घर अपना उजाला कर गया
गया वो छोड़ यहीं पर, अपने सभी असबाब
जो लाया था वो सबके हवाला कर गया
जिया ऐसे, जैसे कयामत में कोई आफ़ताब
मरा, तो पूरी दुनिया का निवाला कर गया
लोग पागल हो गए, जमा करते रहे ताहयात
वो गँवा के सब सबको धनवाला कर गया
रौशनी ही तकमील थी उसकी "प्रकाश"
वो दीया था जो जलकर उजाला कर गया
शुक्रवार, 22 अगस्त 2014
रविवार, 22 जून 2014
शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014
मंगलवार, 24 दिसंबर 2013
बुधवार, 24 अप्रैल 2013
अजन्मी की गुहार
लख चौरासी बाद जनम यह
मानुस जनम हमार
पइयाँ पड़त बाबुल हमारा तोहरा
जिनगी दई द उधार
मैं बिटिआ गरभ जनि मारहु
मोहि परिखहु एक बार
पइयाँ दबइबो पनिया पिऐबो
खएगा बनैबो तोहार
मैं तोरी सोनचिरैया बाबुल
करिहौं घर उजियार
उड़ी जईहौं फिर फुर्र से एक दिन
कर के नगर अन्हार
एकै बात समझ नहीं आवै
कौन कसूर हमार
काहे कन्हैया को पलना खेलाए
पटक्यों मोहि पे पहार
काहे बाबुल तिरछी बोलैं
काहे भए उदास
काहे निठुर भइ मैया तुम भी
मैं तो बिटिया तोहार
लख चौरासी बाद जनम यह
मानुस जनम हमार
पइयाँ पड़त बाबुल हमारा तोहरा
जिनगी दई द उधार
मैं बिटिआ गरभ जनि मारहु
मोहि परिखहु एक बार
पइयाँ दबइबो पनिया पिऐबो
खएगा बनैबो तोहार
मैं तोरी सोनचिरैया बाबुल
करिहौं घर उजियार
उड़ी जईहौं फिर फुर्र से एक दिन
कर के नगर अन्हार
एकै बात समझ नहीं आवै
कौन कसूर हमार
काहे कन्हैया को पलना खेलाए
पटक्यों मोहि पे पहार
काहे बाबुल तिरछी बोलैं
काहे भए उदास
काहे निठुर भइ मैया तुम भी
मैं तो बिटिया तोहार
गुरुवार, 17 जनवरी 2013
सोमवार, 14 जनवरी 2013
मंगलवार, 1 जनवरी 2013
2013
शायद
नई सुबह हो अबके
शायद
नई खबर हो,
अबके
शायद वो भी जागें
जिन्हें
स्वप्न की बस लत हो.
शायद
देख बहन बेटी को रोता अबके
आँखें
कातिल की भी नम हों,
आखरी
जन तक पहुँचे खुशियाँ अबके
शायद
अबके यही प्रण हो.
शायद अबके
बूढ़े देश की अपनी
आँखें यूँ ना नम हो
नववर्ष आपका मंगलमय हो .
ओम प्रकाश मिश्र
I have tried to translate my poem:
(Probably this time we
may see a new dawn.
Probably there may be a new news this time
Probably this time those can also be awaken
Who are addicted to
dreams only
Probably this time
after seeing weeping sisters/daughters
The eyes of Killer also
may get wet
This time the happiness
may reach to the last person
Probably this could be
our commitment this time
Probably this time the eyes of my Old country
May not get wet as it
happened
YOUR NEW YEAR MAY
BECOME MANGALMAY.)
O.P.Mishra
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