गुरुवार, 10 नवंबर 2011

तुम्हारी याद माना इबादत तो नहीं
मगर दोनों का मंजर एक सा है

सोमवार, 3 मई 2010

१. गम ये नहीं कि ग़मों का समंदर मिरे आगे
गम ये कि अब हमें कोई गम नहीं
होता

२ कब्र में आ के भी बेअदब निकला
अपनी कौफिन से बड़ा निकला