बेअदब
खुद से जब आँख मिलाता हूँ तो ग़ज़ल होती है दिल के हालात बताता हूँ तो ग़ज़ल होती है
शनिवार, 21 अप्रैल 2012
ये तो वफ़ा मुहब्बत ईमान की बातें हैं
ना मालूम
किस जहान की बातें हैं
सोए ख्वाबों की ताबीरात करते
जो न कह पाए वो बात करते
तुम हवाओं में विखरे पड़े हो
गर जो होते मुलाकात करते
सोमवार, 26 मार्च 2012
तुम्ही से शुरू हुई तुम तक ही रही
जिन्दगी मिरी मुख्तसर ही रही
रुदादे ईश्क और क्या होता
एक तुम होते एक मैं होता
शनिवार, 3 मार्च 2012
पुरानी याद के मंजर ख्यालों से गुजरते हैं
तुम्हें हम क्या बताएं दिन मेरे कैसे गुजरते है
शनिवार, 18 फ़रवरी 2012
इस
शहर
में
कुछ
खास
खास
लगता
है
शायद
कोई
आस
पास
रहता
है
कहने
को
मेरे
पास
बहुत
कम
था
एक
तेरा
गम
था
एक
मेरा
गम
था
शुक्रवार, 20 जनवरी 2012
मौन
जब
जब
बोलता
है
अवनि
अम्बर
डोलता
है
चाँद
यूँ
ही
चाँद
नहीं
हो
जाता
देखने
वालों
की
नजर
का
असर
पड़ता
है
गुरुवार, 10 नवंबर 2011
तुम्हारी
याद
माना
इबादत
तो
नहीं
मगर
दोनों
का
मंजर
एक
सा
है
सोमवार, 3 मई 2010
१.
गम
ये
नहीं
कि
ग़मों
का
समंदर
मिरे
आगे
गम
ये
कि
अब
हमें
कोई
गम
नहीं
होता
२
कब्र
में
आ
के
भी
बेअदब
निकला
अपनी
कौफिन
से
बड़ा
निकला
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